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भारत के रियल एस्टेट सेक्टर से जनवरी से मार्च 2026 के बीच एक चौंकाने वाली खबर आई है। इस दौरान जितनी डील्स हुईं, उनकी संख्या तो काफी अच्छी रही, लेकिन उनकी कुल कीमत यानी डील वैल्यू में भारी गिरावट देखने को मिली। ग्रांट थॉर्नटन भारत की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस तिमाही में कुल डील वैल्यू सिर्फ 763 मिलियन डॉलर रही, जो इससे पिछली तिमाही (अक्टूबर–दिसंबर 2025) के मुकाबले 63 फीसदी कम है। सीधे शब्दों में कहें तो बाजार में खरीद-बिक्री तो हुई, लेकिन बड़े सौदे नदारद रहे।
गिरावट की मुख्य वजह क्या रही
इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि इस बार कोई बड़ा सौदा नहीं हुआ। रियल एस्टेट बाजार में अक्सर कुछ बहुत बड़े लेनदेन होते हैं जो पूरी डील वैल्यू को ऊपर उठा देते हैं। जनवरी–मार्च 2026 में ऐसा कोई बड़ा सौदा नहीं हुआ। इसकी जगह छोटे और मध्यम आकार के सौदे ज्यादा हुए। इसके अलावा, पूंजी बाजार यानी कैपिटल मार्केट से भी इस बार कोई मदद नहीं मिली। न कोई IPO (आरंभिक सार्वजनिक पेशकश) आया और न ही कोई QIP (क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट) हुआ। इसका मतलब यह है कि बड़ी रकम जुटाने के जो मुख्य रास्ते होते हैं, वे इस तिमाही में पूरी तरह बंद रहे। यह आंकड़ा 2023 की आखिरी तिमाही के बाद का सबसे कम तिमाही डील वैल्यू है, जो बताता है कि बड़े निवेशक अभी थोड़े सतर्क हैं।
डील्स की संख्या बढ़ने के बावजूद वैल्यू क्यों घटी
यह सवाल बहुत स्वाभाविक है कि जब डील्स की संख्या इतनी अच्छी थी, तो वैल्यू इतनी कम क्यों रही। इस तिमाही में कुल 32 डील्स हुईं, जो अब तक के इतिहास में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। इससे पहले सिर्फ 2025 की तीसरी तिमाही में इससे ज्यादा डील्स हुई थीं। लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि 32 छोटे-मध्यम सौदे मिलकर भी उतनी रकम नहीं बना सकते जितनी एक या दो बड़े सौदे अकेले बना देते हैं। प्राइवेट इक्विटी डील्स में तो 71 फीसदी की भारी गिरावट आई यह 1,590 मिलियन डॉलर से घटकर सिर्फ 458 मिलियन डॉलर पर आ गई। वहीं, मर्जर और अधिग्रहण यानी M&A डील्स में 38 फीसदी की कमी आई और यह 493 मिलियन डॉलर से घटकर 305 मिलियन डॉलर रह गई। यानी दोनों ही मोर्चों पर बड़े पैमाने पर पूंजी का आना कम हुआ है। निवेश के ट्रेंड में क्या बदलाव आया
इस तिमाही में यह भी साफ दिखा कि निवेशकों की पसंद बदल रही है। अब वे आवासीय यानी घर-मकान वाले प्रोजेक्ट्स की बजाय कमर्शियल संपत्तियों की तरफ ज्यादा झुक रहे हैं। खासतौर पर ऑफिस और रिटेल (दुकानें/मॉल) जैसी संपत्तियों में निवेश की रुचि बढ़ी है। इसकी वजह यह है कि इस तरह की संपत्तियां नियमित किराये से आमदनी देती हैं, जिससे निवेशकों को स्थिर रिटर्न मिलता है। विदेशी निवेशकों की तुलना में इस बार घरेलू निवेशकों की हिस्सेदारी ज्यादा रही, जो यह दिखाता है कि भारतीय निवेशकों का अपने रियल एस्टेट बाजार पर भरोसा बना हुआ है।
आगे रियल एस्टेट सेक्टर के लिए क्या संकेत हैं
ग्रांट थॉर्नटन भारत की पार्टनर और रियल एस्टेट इंडस्ट्री लीडर शबाला शिंदे का कहना है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है। उनके अनुसार बाजार का यह रुख एक सोची-समझी सावधानी है, न कि कोई संकट। निवेशक अब हर सौदे को बहुत ध्यान से परखकर कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि संपत्ति कितनी आमदनी दे रही है और उसे चलाने की क्षमता कितनी है। दुनियाभर में चल रही आर्थिक उथल-पुथल और भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह सावधानी समझ में आती है। लेकिन डील्स की संख्या का ऊंचा रहना यह भी बताता है कि बाजार में रुकावट नहीं है, बस रफ्तार थोड़ी नपी-तुली है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, भारत का रियल एस्टेट बाजार अभी एक ऐसे दौर में है जहां सक्रियता है, लेकिन बड़े जोखिम लेने से परहेज किया जा रहा है। 63 फीसदी की गिरावट सुनने में भले ही बड़ी लगे, लेकिन यह बड़े सौदों की गैरमौजूदगी का नतीजा है, न कि बाजार के कमजोर पड़ने का। निवेशकों के लिए यह समय सोच-समझकर कदम रखने का है। जो लोग लंबे समय के लिए निवेश करना चाहते हैं, उनके लिए कमर्शियल संपत्तियां एक अच्छा विकल्प बनकर उभर रही हैं। बाजार की नींव मजबूत है बस बड़े खिलाड़ी सही मौके का इंतजार कर रहे हैं।